इर्ष्या, द्वेष,
स्वार्थ, मेरे - तेरे,
इतने घने हो गए की
उसमे हमारा 'कुछ' खो गया है.
वेद, अजान
घंटे, शंख्ध्वनी
किस्म किस्म की आवाजें
आपस में टकराकर
अपनी पहचान खो रही है, और
' टकराहटें ' हमारी कानों को छूतीं
दिल में उतरती और दिमाग को कुरेदती है.
आवाजों से एक नयी आवाज नहीं पैदा हुई
बल्कि उनकी टकराहटों ने ही
दूसरी टकराहटों को जन्म दिया
दीप से दीप नहीं जला
बल्कि धुएं से धुयाँ टकराया
आसमान से टकराहटें बरसती रहीं
और बेचारी धरती, उन्हें बटोरती रही
केवल टकराहटें शेष रहीं और आवाजें मर गयी
हमारी इन आवाजों की टकराहट में
हमारा कुछ खो गया है
हम क्या है? हमारा कुछ क्या है?
इसका जबाब कौन देगा,
धर्म की पुस्तकें ???
वे तो और अधिक सवाल पैदा करती हैं
वे तो और अधिक सवाल पैदा करती हैं
दीवारें बनातीं हैं
निहायत ही पारदर्शी दीवारें
जो हमारे चारो तरफ उठती जातीं हैं
और हम घिरते जाते हैं
हम बंटते चले जाते हैं
अजीब हैं ये दीवारें जिनके भीतर से हमें
हिन्दू दिखाई देता है,
मुस्लमान दिखाई देता है
सिख और ईसाई दिखाई देता है है
पर आदमी नहीं दिखाई देता है
अजीब हैं ये दीवारें जिनके भीतर से हम
मंदिर का शंखनाद, मस्जिद का अजान
गुरूद्वारे की वालियां और गिरजा का घंटा सुनते हैं
पर इश्वर की आवाज नहीं सुन पाते
हम इन नकली आवाजों पे अपना सर पटक रहे है
कोई मंदिर के लिए परेशान है
कोई मस्जिद के लिए,
किसी को चिंता है की स्वर्ण मंदिर अपवित्र हो गया
किसी को गुस्सा है की-
मस्जिद में सूअर की हड्डी मिली
यह हड्डी हमने बनाई है या ईश्वर ने
और हमें भी किसने बनाये है, उसी ने न ?
तो फिर ?
पत्थर और मिटटी से बने इमारतों के लिए
इतनी हाय तौबा और, इतनी उठा-पटक
हमारे इसी हाय तौबा और उठा-पटक में
हमारा कुछ खो गया है
और हमारा "कुछ"
और कुछ नहीं, स्वयं हम हैं
जो इस घनेपन में और इन टकराहटों में
इन दीवारों और इमारतों के भीड़ में गुम हो गए हैं
यदि नहीं तो-
हम क्यों अलग-अलग
मंदिर मस्जिद
और गुरूद्वारे गिरजा में दौरते और
ईश्वर के यथार्थ मंदिर से
घृणा करते.........?

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