मारा फिरता हूँ दीवानों की तरह
मारा फिरता हूँ दीवानों की तरह
मिले कोई ऐसी जगह जो हो ठिकानों की तरह
मेरी खुशियों को सिक्कों में तौलता है ये जहाँ
क्या मैं दिखता हूँ आपको दूकानों की तरह
साँस भी वाजिबन मिलता नहीं, दम घुटता है
कौन सी चीज़ लिए बैठे हो पैमानों की तरह
अपनी ही नजर बदल गयी, गैरों को क्या कहें
खुद को ही नजर आता हूँ बेगानों की तरह
जिनके हाथों में थमा कर चले गए गुलशन
लौटाया है उन्होंने ही वीरानों की तरह
चुप थे तो अकल्मन्द ही कहते थे सभी
सब सुनाकर लगते हैं नादानों की तरह

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